जहां पूरा देश मनाता है दिवाली, वहां इन गांवों में पसरा रहता है मातम!


जब पूरा देश दीपावली की रात दीपों की रोशनी से जगमगा उठा है, घरों में मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है, बच्चे पटाखों और फुलझड़ियों से खुशियां मनाते हैं, तब उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के कुछ गांवों में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिलती है। यहां दीपावली की रात खुशियों का शोर नहीं, बल्कि खामोशी पसरी रहती है। जहां दुनिया अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव मनाती है, वहीं कुछ परिवार अपने इतिहास के उस दर्द को याद करते हैं, जिसे पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी भुला नहीं पाए हैं।

यह कहानी है मिर्जापुर के राजगढ़ इलाके के भांवा, अटारी समेत आसपास के करीब आधा दर्जन गांवों में रहने वाले चौहान वंश के परिवारों की। इन परिवारों के लिए दीपावली का दिन किसी उत्सव का नहीं, बल्कि अपने पूर्वज राजा को याद करने और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन है।

एक ऐतिहासिक मान्यता, जिसने बदल दी दीपावली की खुशियां

स्थानीय मान्यता के अनुसार, चौहान वंश के राजा पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु दीपावली के दिन मुहम्मद गोरी के हाथों हुई थी। इसी ऐतिहासिक स्मृति और अपने राजा के प्रति सम्मान की भावना के कारण इन गांवों के चौहान वंश के परिवार सदियों से दीपावली को शोक दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं।

जिस रात पूरा देश दीप जलाकर खुशियां मनाता है, उसी रात इन परिवारों के घरों में अंधेरा रहता है। यह अंधेरा किसी अभाव का प्रतीक नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति अटूट सम्मान और पीढ़ियों से चली आ रही भावनात्मक विरासत का हिस्सा है।

एक दीया जलता है, फिर पूरे घर में छा जाती है खामोशी

इस परंपरा को निभाने वाले परिवार दीपावली के दिन पूजा-पाठ पूरी तरह बंद नहीं करते। वे मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करते हैं और घर में केवल एक दीया जलाते हैं। इसके बाद घर में दूसरे दीपक नहीं जलाए जाते। न घर को रोशनी से सजाया जाता है और न ही सामान्य तरीके से उत्सव मनाया जाता है।

परिवार के लोग दिनभर शांत रहते हैं और अपने पूर्वज राजा की स्मृति में शोक प्रकट करते हैं। कल्पना कीजिए, जब आसपास के गांवों में दीपों की कतारें जगमगा रही हों, मिठाइयां बांटी जा रही हों और हर तरफ उत्सव का माहौल हो, तब इन परिवारों के घरों में अपने इतिहास की याद में सन्नाटा पसरा रहता है।

दीपावली नहीं, एकादशी को मनाते हैं खुशियों का त्योहार

इस परंपरा की सबसे भावुक बात यह है कि इन परिवारों ने खुशियां मनाना छोड़ा नहीं है, बल्कि उनके उत्सव का दिन अलग है।

स्थानीय निवासी रामधनी सिंह चौहान के मुताबिक, उनके वंश में दीपावली का वास्तविक उत्सव एकादशी के दिन मनाया जाता है। दीपावली पर शोक की परंपरा निभाने के बाद एकादशी को घरों में खुशियां लौट आती हैं। घरों को दीपों से सजाया जाता है, विधि-विधान से पूजा होती है, मिठाइयां बांटी जाती हैं और परिवार के लोग एक-दूसरे के साथ त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।

रामधनी सिंह चौहान बताते हैं कि यह परंपरा कुछ वर्षों या दशकों की नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्षों से उनके वंश में चली आ रही है। परिवार के बुजुर्गों से मिली इस विरासत को आज की नई पीढ़ी भी उसी सम्मान के साथ आगे बढ़ा रही है।

समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन नहीं बदली पूर्वजों की याद

आज के दौर में जहां त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, वहीं मिर्जापुर के इन गांवों में रहने वाले चौहान वंश के परिवारों ने अपनी पुरानी परंपरा को जीवित रखा है। उनके लिए यह केवल दीपावली न मनाने की रस्म नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के इतिहास, सम्मान और पारिवारिक पहचान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है।

एक तरफ पूरा देश दीपावली पर अंधकार को मिटाकर प्रकाश का स्वागत करता है, तो दूसरी तरफ इन परिवारों के लिए वही रात इतिहास के एक दर्दनाक अध्याय को याद करने का अवसर बन जाती है।

सचमुच, भारत की संस्कृति और परंपराओं की यही खूबसूरती है कि एक ही त्योहार अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग भावनाओं और मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। मिर्जापुर के इन गांवों की कहानी बताती है कि कुछ यादें समय के साथ धुंधली नहीं होतीं। वे पीढ़ियों के दिलों में जिंदा रहती हैं।

किसी के लिए दीपावली रोशनी और खुशियों का त्योहार है, तो किसी के लिए अपने पूर्वजों को याद करने और उनकी विरासत को संजोकर रखने का दिन। मिर्जापुर के इन परिवारों की परंपरा इसी इतिहास, सम्मान और भावनाओं की एक अनोखी मिसाल है।

मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू संपादक: रोहित कुमार सोनू

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