मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू
बिहार के सीतामढ़ी जिले में धार्मिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की एक ऐसी अनूठी मिसाल देखने को मिलती है, जो समाज को नफरत भुलाकर मोहब्बत और एकता का संदेश देती है। यहां मुस्लिम समुदाय के कारीगर अपने हाथों से मिट्टी के दीये और हिंदू धर्म के पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली सामग्री तैयार करते हैं। इन्हीं दीयों से दीपावली के अवसर पर हजारों घर रोशन होते हैं।
सीतामढ़ी जिला मुख्यालय डुमरा के समीप स्थित सिमरा गांव इस अनूठी परंपरा का गवाह है। इस गांव में मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा वर्षों से मिट्टी के बर्तन, दीये और पूजा में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी की सामग्री बनाने के कारोबार से जुड़ा हुआ है। यहां चाक पर अपनी कला का प्रदर्शन करने वाले कारीगरों के लिए न कोई धर्म बड़ा है और न कोई मजहब। वे अपने कर्म और हुनर को ही सबसे बड़ा धर्म मानते हैं।
सिमरा गांव के इन हुनरमंद कारीगरों की मेहनत से तैयार मिट्टी के दीये सीतामढ़ी के अलावा आसपास के कई जिलों में भेजे जाते हैं। दीपावली के मौके पर इन दीयों की मांग काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि त्योहार की तैयारियों में इन कारीगरों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
हैरानी की बात यह है कि धार्मिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले सीतामढ़ी में हजारों हिंदू परिवार दीपावली की पूजा और घरों की सजावट के लिए मुस्लिम कारीगरों के हाथों से तैयार किए गए दीयों और मिट्टी की पूजन सामग्री का इस्तेमाल करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी दोनों समुदायों के बीच आपसी विश्वास और भाईचारे को मजबूत कर रही है।
सिमरा गांव की यह तस्वीर बताती है कि इंसानियत, मेहनत और मोहब्बत का कोई धर्म नहीं होता। जहां एक समुदाय के हाथों से तैयार किए गए दीये दूसरे समुदाय के घरों में रोशनी फैलाते हैं, वहीं यह परंपरा पूरे समाज को एकता और सद्भाव का संदेश देती है।
मिथिला हिन्दी न्यूज | संपादक: रोहित कुमार सोनू
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