संवाद
दुर्गा पूजा हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा और आस्था से जुड़ा पर्व है। इस पर्व की शुरुआत कलश स्थापना या घट स्थापना से होती है। इसे पूजा का पहला और सबसे पवित्र चरण माना जाता है। बिना कलश स्थापना के दुर्गा पूजा की शुरुआत अधूरी मानी जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर दुर्गा पूजा में कलश स्थापना क्यों की जाती है और इसका क्या महत्व है—
1. शुभ और मांगलिक प्रतीक
कलश को मंगल और शुभता का प्रतीक माना जाता है। यह पूजा स्थल पर स्थापित होने के बाद देवी-देवताओं के आह्वान का केंद्र बन जाता है। कलश को स्थापित कर मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है।
2. देवी शक्ति का आवाहन
शास्त्रों के अनुसार, कलश में मां दुर्गा सहित सभी देवताओं और शक्तियों का वास माना जाता है। पूजा की अवधि में इसे मां दुर्गा का जीवंत स्वरूप मानकर पूजते हैं। कलश स्थापना के माध्यम से भक्त मां दुर्गा को अपने घर और पूजा स्थल पर विराजमान करते हैं।
3. पंच तत्व का प्रतिनिधित्व
कलश केवल एक पात्र नहीं है, बल्कि पूरे ब्रह्मांड के पांच तत्वों (पंचतत्व) का प्रतीक है।
- कलश में भरा जल जल तत्व का प्रतीक है।
- नारियल और आम के पत्ते पृथ्वी और वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- कलश पर बंधा हुआ सूत्र और पूजा की विधियां आकाश और अग्नि तत्व का संकेत हैं।
इस प्रकार, कलश में संपूर्ण सृष्टि का स्वरूप समाहित हो जाता है।
4. समृद्धि और शांति का संकेत
कलश स्थापना से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नारियल को शुद्धता और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है, जबकि जल जीवन का आधार है। यही कारण है कि इसे घर और समाज में सुख-शांति का वाहक माना गया है।
5. पूजा का केंद्रबिंदु
पूजा की पूरी विधि कलश के चारों ओर संपन्न होती है। इसे देवी की उपस्थिति मानकर पूरे नौ दिनों तक पूजते हैं। कलश स्थापना यह संदेश देती है कि मां दुर्गा स्वयं भक्तों के बीच उपस्थित हैं और उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण करेंगी।
✨ इसलिए दुर्गा पूजा में कलश स्थापना मात्र एक परंपरा नहीं, बल्कि यह शक्ति, समृद्धि और मंगल का प्रतीक है। यह भक्त और देवी के बीच आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का माध्यम भी है।
धार्मिक और सांस्कृतिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए मिथिला हिन्दी न्यूज।