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भरत तिवारी एनकाउंटर पर उठे गंभीर सवाल: सरेंडर के बाद क्यों चली गोलियां, मंत्री के बयान से बढ़ी जांच की मांग
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June 19, 2026
भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में हुए कथित पुलिस एनकाउंटर ने बिहार की राजनीति, प्रशासन और पुलिस व्यवस्था को बड़े सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। पुलिस की गोली से घायल भरत भूषण तिवारी की पटना में इलाज के दौरान मौत के बाद यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है। अब इस घटना पर बिहार सरकार के मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय कुमार सिन्हा की प्रतिक्रिया ने बहस को और तेज कर दिया है।
विजय कुमार सिन्हा ने इस घटना को दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि सरकार मामले को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस समस्या का समाधान आसानी से किया जा सकता था, उसे जिस तरीके से अंजाम दिया गया, वह उचित नहीं लगता और इसमें प्रशासनिक लापरवाही दिखाई देती है। मंत्री का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आमतौर पर ऐसे मामलों में सरकार और पुलिस एक-दूसरे के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल उस वीडियो को लेकर उठ रहा है, जो सोशल मीडिया पर सामने आया है। वीडियो में कथित तौर पर भरत तिवारी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करते हुए दिखाई देता है और अपने पास मौजूद हथियार पुलिस को सौंपता नजर आता है। यदि वीडियो में दिख रही स्थिति वास्तविक है, तो सवाल यह उठता है कि हथियार डालने के बाद गोली चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि व्यक्ति पुलिस के नियंत्रण में आ चुका था, तो फिर उस पर घातक बल का प्रयोग क्यों किया गया?
घटना के बाद भोजपुर पुलिस ने दावा किया था कि भरत तिवारी मानसिक रूप से अस्वस्थ था और उसका इलाज कोईलवर मानसिक आरोग्यशाला में चल चुका था। पुलिस का यह भी कहना था कि उसने पुलिस टीम को धमकाने और बंधक बनाने जैसी गतिविधियां की थीं। हालांकि इस दावे के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। यदि वह मानसिक रूप से बीमार था, तो क्या उसे काबू में करने के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिक सहायता या अन्य वैकल्पिक उपायों का सहारा लिया गया? क्या गोली चलाना ही एकमात्र विकल्प था?
भरत तिवारी की मौत के बाद ग्रामीणों और परिजनों में भारी आक्रोश देखा गया। लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके और यदि किसी स्तर पर गलती हुई है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो।
अब जनता कई अहम सवालों के जवाब चाहती है। यदि आत्मसमर्पण हुआ था तो गोली चलाने का आदेश किसने दिया? फायरिंग किन परिस्थितियों में हुई? क्या सभी पुलिसकर्मियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी? और क्या इस मामले की मजिस्ट्रियल या न्यायिक जांच कराई जाएगी?
भरत तिवारी की मौत अब केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। यह कानून के शासन, मानवाधिकारों और पुलिस जवाबदेही से जुड़ा एक गंभीर विषय बन चुका है। एक ओर पुलिस अपने पक्ष में दलीलें दे रही है, वहीं दूसरी ओर सामने आए वीडियो और परिजनों के आरोप इस घटना को संदेह के घेरे में खड़ा कर रहे हैं।
ऐसे में निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि यह पुलिस की मजबूरी में की गई कार्रवाई थी या फिर ऐसी घटना, जिसने कानून व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। फिलहाल पूरा बिहार एक ही सवाल का जवाब तलाश रहा है—यदि भरत तिवारी ने हथियार डाल दिए थे, तो फिर गोलियां क्यों चलीं?
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