रामविलास पासवान की 80वीं जयंती: 2005 का वह ऐतिहासिक फैसला जिसने बदल दी बिहार की राजनीति, आज भी याद किया जाता है उनका राजनीतिक साहस

पटना: बिहार की राजनीति में कुछ ऐसे नेता हुए, जिनके फैसलों ने केवल सरकारें नहीं बदलीं, बल्कि पूरे राजनीतिक इतिहास की दिशा और दशा तय कर दी। ऐसे ही नेताओं में सबसे प्रमुख नाम है रामविलास पासवान का। आज अगर वे हमारे बीच होते तो अपना 80वां जन्मदिन मना रहे होते। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनके नहीं रहने के बावजूद उनका व्यक्तित्व, संघर्ष और राजनीतिक विरासत आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जीवित है। दलित, पिछड़े, गरीब और वंचित समाज की बुलंद आवाज रहे रामविलास पासवान ने अपने पांच दशक से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में कई बार सत्ता के समीकरण बदले। लेकिन वर्ष 2005 में लिया गया उनका एक फैसला आज भी बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट माना जाता है। यह वही फैसला था, जिसने 15 वर्षों से चली आ रही सत्ता की तस्वीर बदल दी और बिहार में एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत हुई। जब बिहार में आया था अधूरा जनादेश साल 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति के सबसे दिलचस्प चुनावों में गिना जाता है। उस समय जनता बदलाव चाह रही थी। कानून-व्यवस्था, विकास, सड़क, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे चुनाव के केंद्र में थे। चुनाव परिणाम आने के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल (राजद) 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि जदयू-भाजपा गठबंधन को 92 सीटें मिलीं। वहीं लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) ने 29 सीटें जीतकर सत्ता की चाबी अपने हाथ में ले ली। पूरे देश की नजरें रामविलास पासवान के अगले कदम पर टिक गई थीं। एक फैसला जिसने इतिहास लिख दिया राजद को उम्मीद थी कि एलजेपी उसका साथ देगी और सरकार बन जाएगी। दूसरी ओर भाजपा और जदयू गठबंधन भी पासवान को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन रामविलास पासवान ने ऐसा फैसला लिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वे न भाजपा को समर्थन देंगे और न ही राजद के साथ सरकार बनाएंगे। उनका मानना था कि बिहार को नई राजनीति और नई दिशा की जरूरत है। उनके इस निर्णय के कारण कोई भी दल सरकार नहीं बना सका और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। फिर आया बदलाव का दौर कुछ महीनों बाद दोबारा विधानसभा चुनाव हुए। इस बार जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया और नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी। इसी के साथ 1990 से चली आ रही लालू-राबड़ी सरकार का अध्याय समाप्त हो गया और बिहार की राजनीति में विकास एवं सुशासन की नई बहस शुरू हुई। राजनीतिक जानकार आज भी मानते हैं कि यदि उस समय रामविलास पासवान राजद को समर्थन दे देते, तो बिहार की राजनीति की तस्वीर पूरी तरह अलग होती। उनका एक फैसला आने वाले दो दशकों की राजनीति की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। गरीबों की आवाज थे रामविलास पासवान रामविलास पासवान सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि गरीबों, दलितों, पिछड़ों और समाज के वंचित वर्गों की आवाज थे। उन्होंने कई बार केंद्र सरकार में मंत्री रहते हुए जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाया। अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी पहचान एक प्रभावशाली जननेता के रूप में बनाए रखी। आज उनकी 80वीं जयंती पर बिहार के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहे हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि राजनीति में उनकी सादगी, संघर्ष और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता हमेशा प्रेरणा देती रहेगी। इतिहास में हमेशा याद रहेगा 2005 का फैसला बिहार की राजनीति में कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन वर्ष 2005 का अधूरा जनादेश और रामविलास पासवान का समर्थन से इनकार आज भी सबसे चर्चित राजनीतिक घटनाओं में शामिल है। यह केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि ऐसा मोड़ था जिसने बिहार की सत्ता, सामाजिक समीकरण और चुनावी राजनीति को नई दिशा दी। आज उनकी जयंती पर लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को याद कर रहे हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक नेता का साहसिक फैसला इतिहास की धारा बदल सकता है। ✍️ रिपोर्ट: रोहित कुमार सोनू 📍 मिथिला हिन्दी न्यूज बिहार की राजनीति, समाज और देश-दुनिया की हर बड़ी एवं विश्वसनीय खबर के लिए पढ़ते रहिए मिथिला हिन्दी न्यूज
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