दरभंगा/सीतामढ़ी। एक समय था जब किसी भी शहर या कस्बे के मुख्य बाजार में घड़ियों का अलग शोरूम हुआ करता था। नई घड़ी खरीदना केवल जरूरत नहीं, बल्कि एक शौक और प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी। स्कूल में अच्छे अंक आने पर माता-पिता बच्चों को घड़ी उपहार में देते थे। नौकरी लगने पर पहली सैलरी से घड़ी खरीदना कई युवाओं का सपना होता था। शादी-ब्याह और त्योहारों पर भी घड़ी सबसे पसंदीदा उपहारों में शामिल रहती थी।
लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
अगर आप किसी बाजार में घड़ी की दुकान ढूंढने निकलें, तो शायद काफी देर तलाश करनी पड़े। पहले जहां हर बड़े बाजार में घड़ियों के कई शोरूम दिखाई देते थे, वहीं आज अधिकांश दुकानें बंद हो चुकी हैं या फिर मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकानों में एक छोटे से कोने तक सीमित होकर रह गई हैं।
मोबाइल ने बदल दी लोगों की आदत
विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल ने घड़ी की जरूरत को काफी हद तक कम कर दिया है। अब समय देखने के लिए लोग जेब से मोबाइल निकाल लेते हैं। मोबाइल में केवल समय ही नहीं, बल्कि अलार्म, कैलेंडर, स्टॉपवॉच और कई अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। यही कारण है कि सामान्य उपयोग के लिए अलग से घड़ी खरीदने वालों की संख्या लगातार घटती गई।
बदल गई खरीदारी की संस्कृति
पहले लोग हर कुछ वर्षों में नई घड़ी खरीदते थे, लेकिन अब अधिकांश लोग तभी घड़ी खरीदते हैं जब उन्हें फैशन, ब्रांड या फिटनेस ट्रैकिंग का शौक हो। स्मार्टवॉच के आने से पारंपरिक घड़ियों का बाजार और भी प्रभावित हुआ है।
छोटे दुकानदारों पर सबसे ज्यादा असर
घड़ियों की बिक्री पर निर्भर रहने वाले छोटे दुकानदारों का कारोबार सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। कई दुकानदारों ने अपना व्यवसाय बदल लिया, जबकि कुछ ने घड़ियों के साथ मोबाइल एक्सेसरी, चश्मा या अन्य सामान बेचना शुरू कर दिया। कई पुराने घड़ी मरम्मत करने वाले कारीगर भी अब बहुत कम दिखाई देते हैं।
फिर भी खत्म नहीं हुई घड़ी की अहमियत
हालांकि रोजमर्रा की जरूरत के रूप में घड़ी का इस्तेमाल कम हुआ है, लेकिन इसकी अहमियत पूरी तरह खत्म नहीं हुई। आज भी कई लोग घड़ी को अपनी पहचान, व्यक्तित्व और स्टाइल का हिस्सा मानते हैं। महंगी ब्रांडेड घड़ियां आज भी स्टेटस सिंबल मानी जाती हैं, जबकि स्मार्टवॉच ने युवाओं के बीच नई जगह बनाई है।
समय बदला, बाजार भी बदल गया
तकनीक ने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ कई पारंपरिक कारोबार भी धीरे-धीरे सिमटते चले गए। घड़ियों का बाजार इसका एक बड़ा उदाहरण है। जहां कभी घड़ी की टिक-टिक हर बाजार में सुनाई देती थी, वहीं आज उसकी जगह मोबाइल की घंटियां और नोटिफिकेशन ने ले ली है।
शायद यही समय का सबसे बड़ा सच है—वक्त हमेशा चलता रहता है, लेकिन वक्त के साथ बाजार और लोगों की आदतें भी बदल जाती हैं।
रिपोर्ट: Mithila Hindi News
संपादक: रोहित कुमार सोनू
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