बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला जितिया व्रत (जीवित्पुत्रिका व्रत) मातृत्व, त्याग और संतान के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 2025 का जितिया व्रत संपन्न हो चुका है और अब श्रद्धालुओं की नजर वर्ष 2026 के पर्व पर है। धार्मिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में जितिया व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा।
यह व्रत विशेष रूप से पुत्र-पुत्रियों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने वाली महिलाओं की संतान सभी प्रकार के संकटों से सुरक्षित रहती है और जीवन में सफलता प्राप्त करती है।
जितिया व्रत 2026 की तिथि और मुहूर्त
पंचांग के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर यह व्रत किया जाता है।
अष्टमी तिथि प्रारंभ: 3 अक्टूबर 2026, सुबह 07:59 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 4 अक्टूबर 2026, सुबह 05:51 बजे
पूजा का शुभ मुहूर्त
- सुबह 07:44 बजे से सुबह 09:12 बजे तक
- दोपहर 12:10 बजे से शाम 04:36 बजे तक
इन शुभ मुहूर्तों में पूजा-अर्चना करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
तीन दिनों तक चलता है जितिया पर्व
जितिया व्रत केवल एक दिन का उपवास नहीं है, बल्कि यह तीन दिनों तक चलने वाला महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है।
पहला दिन: नहाय-खाय
व्रती महिलाएं नदी, तालाब या पवित्र जलाशय में स्नान करती हैं। इसके बाद शुद्ध और सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत की तैयारी शुरू करती हैं।
दूसरा दिन: निर्जला उपवास
इस दिन महिलाएं पूरे 24 घंटे तक बिना जल ग्रहण किए कठोर निर्जला व्रत रखती हैं। व्रत के दौरान अन्न, फल, दूध, पानी या किसी भी प्रकार का खाद्य पदार्थ ग्रहण नहीं किया जाता। धार्मिक नियमों के अनुसार ब्रह्मचर्य और पूर्ण संयम का पालन किया जाता है।
तीसरा दिन: पारण
अगले दिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इसके बाद महिलाएं भोजन और जल ग्रहण करती हैं।
जितिया व्रत में किसकी पूजा की जाती है?
जितिया व्रत में मुख्य रूप से जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। महिलाएं कुशा से बनी जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित करती हैं और विधि-विधान से पूजा करती हैं।
इसके अलावा मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। इनकी पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। लोक परंपराओं के अनुसार यह पूजा संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
भगवान श्रीकृष्ण और जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद जब अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहा शिशु मृत हो गया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने तप, धर्म और पुण्य के प्रभाव से उस बालक को पुनर्जीवित कर दिया। वही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित कहलाया।
मान्यता है कि जीवित्पुत्रिका व्रत के पुण्य प्रभाव का संबंध भी संतान की रक्षा और दीर्घायु से जुड़ा हुआ है। इसी कारण यह व्रत माताओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।
जितिया व्रत की पौराणिक कथा
प्राचीन काल में जीमूतवाहन नामक एक महान और दयालु राजा थे। युवावस्था में ही उन्होंने अपना राजपाट त्याग दिया और अपने माता-पिता की सेवा के लिए वन में चले गए।
एक दिन जंगल में भ्रमण करते समय उनकी मुलाकात एक नागमाता से हुई। नागमाता अत्यंत दुखी होकर विलाप कर रही थीं। जब जीमूतवाहन ने उनके दुख का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश पर गरुड़ का संकट है।
नागों और गरुड़ के बीच समझौता हुआ था कि प्रतिदिन एक नाग गरुड़ के भोजन के लिए भेजा जाएगा ताकि पूरा नागवंश नष्ट न हो। उस दिन नागमाता के पुत्र की बारी थी।
नागमाता का दुख देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने नागमाता को वचन दिया कि उनके पुत्र की रक्षा करेंगे।
जीमूतवाहन स्वयं नागपुत्र के स्थान पर कपड़े में लिपटकर उस शिला पर जाकर लेट गए जहां गरुड़ अपना भोजन लेने आते थे। कुछ समय बाद गरुड़ आए और उन्हें अपने पंजों में दबाकर पर्वत की ओर उड़ चले।
रास्ते में गरुड़ को आश्चर्य हुआ कि आज उनका शिकार न रो रहा है और न ही चिल्ला रहा है। जब उन्होंने कपड़ा हटाया तो देखा कि वह नाग नहीं बल्कि एक मनुष्य है।
जीमूतवाहन ने पूरी घटना गरुड़ को बताई। उनकी करुणा और त्याग देखकर गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने न केवल जीमूतवाहन को छोड़ दिया बल्कि भविष्य में नागों को न खाने का भी वचन दिया।
तभी से जीमूतवाहन त्याग, दया और संरक्षण के प्रतीक माने जाते हैं तथा जितिया व्रत में उनकी पूजा की जाती है।
क्यों विशेष माना जाता है जितिया व्रत?
जितिया व्रत को हिंदू धर्म के सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। 24 घंटे तक बिना जल के उपवास करना आसान नहीं होता, लेकिन माताएं अपनी संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए यह कठिन तपस्या करती हैं।
यही कारण है कि बिहार, झारखंड और नेपाल के लाखों परिवारों में यह पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना से जुड़ा जितिया व्रत 2026 का यह पर्व एक बार फिर मातृत्व की अद्भुत शक्ति और त्याग का संदेश देगा।
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