जाले में अनोखी दुर्गा पूजा की परंपरा, 45 घंटे तक चलती है विसर्जन यात्रा; झिझिया नृत्य देखने उमड़ती है भीड़

दरभंगा जिले के जाले प्रखंड में दुर्गा पूजा की परंपरा अपनी ऐतिहासिकता और अनूठी विसर्जन यात्रा के लिए खास पहचान रखती है। जाले स्थित पौराणिक महत्व के जालेश्वरीस्थान परिसर में पिछले 66 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना होती चली आ रही है। वर्ष 1960 में जाले थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष दिवाकर प्रसाद सिंह की अहम भूमिका से यहां मां दुर्गा की पूजा की शुरुआत हुई थी। जाले की दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन भी अपने आप में बेहद खास है। महज करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी तय करने में लगभग 40 से 45 घंटे तक का समय लग जाता है। कई बार यह विसर्जन यात्रा करीब तीन दिनों तक चलती है। इस दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूब जाता है। दुर्गा पूजा के मौके पर यहां होने वाला झिझिया नृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। झिझिया देखने के लिए दूर-दराज के इलाकों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। खासकर लंबी विसर्जन यात्रा के दौरान झिझिया नृत्य करने वाली अनेक टोलियां शामिल होती हैं, जो पारंपरिक लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती हैं। जाले की यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि मिथिला की लोक संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक सहभागिता की जीवंत मिसाल भी है। घंटों तक चलने वाली विसर्जन यात्रा में श्रद्धालुओं की आस्था, झिझिया नृत्य और पारंपरिक उत्सव का माहौल जाले की दुर्गा पूजा को अन्य स्थानों से अलग पहचान देता है।
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