मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू
भारत की धरती केवल नदियों, पहाड़ों और मंदिरों की धरती नहीं है, बल्कि यह विचारों, परंपराओं और हजारों वर्षों से चले आ रहे सामाजिक विमर्श की भी धरती है। इसी लंबे इतिहास में कई ऐसे ग्रंथ आए, जिन्होंने समाज, धर्म, आचरण और जीवन को समझने की कोशिश की। मनुस्मृति भी उन्हीं प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में से एक है। लेकिन यह ग्रंथ जितना ऐतिहासिक और प्रभावशाली माना जाता है, उतना ही विवादित भी रहा है।
मनुस्मृति को सामान्यतः धर्मशास्त्र परंपरा का एक प्राचीन ग्रंथ माना जाता है। इसमें व्यक्ति के आचरण, परिवार, विवाह, उत्तराधिकार, राजा और शासन, सामाजिक कर्तव्यों तथा अलग-अलग सामाजिक वर्गों से जुड़े अनेक नियम और विचार मिलते हैं। हालांकि विद्वानों के बीच इसके रचनाकाल, स्वरूप और ऐतिहासिक प्रभाव को लेकर अलग-अलग मत हैं। इसे किसी एक व्यक्ति द्वारा किसी एक समय में लिखी गई आधुनिक अर्थों वाली पुस्तक मानना भी इतिहास की जटिलता को बहुत सरल बना देना होगा।
लेकिन सवाल यह है कि फिर मनुस्मृति को लेकर इतना विवाद क्यों है?
इसका सबसे बड़ा कारण इसमें वर्ण और सामाजिक कर्तव्यों से संबंधित कई ऐसे प्रावधान हैं, जिन्हें आधुनिक समानता और मानवाधिकार के नजरिए से भेदभावपूर्ण माना जाता है। विशेष रूप से जाति, सामाजिक स्थिति और महिलाओं से जुड़े कुछ प्रावधानों की आलोचना लंबे समय से होती रही है। आलोचकों का कहना है कि इन विचारों ने समाज में ऊंच-नीच की व्यवस्था को धार्मिक आधार देने में भूमिका निभाई।
दूसरी ओर, मनुस्मृति को समझने वाले कुछ विद्वान यह तर्क देते हैं कि किसी प्राचीन ग्रंथ को उसके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ से अलग करके केवल आज के मानकों से पढ़ना उचित नहीं है। उनके अनुसार मनुस्मृति अपने समय के सामाजिक नियमों और धारणाओं को प्रस्तुत करने वाला ग्रंथ है और इसके प्रभाव तथा व्याख्या को लेकर भी इतिहास में काफी जटिलता रही है।
यही वह जगह है जहां मनुस्मृति केवल एक किताब नहीं रह जाती, बल्कि भारत के सामाजिक इतिहास और बराबरी के सवाल से जुड़ा विषय बन जाती है।
आधुनिक भारत में मनुस्मृति की सबसे तीखी आलोचनाओं में डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम प्रमुखता से सामने आता है। आंबेडकर जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के कट्टर विरोधी थे। 25 दिसंबर 1927 को महाराष्ट्र के महाड में उनके नेतृत्व में मनुस्मृति के एक संस्करण का सार्वजनिक रूप से दहन किया गया। यह घटना भारतीय सामाजिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गई। इसका संदेश था कि जन्म के आधार पर किसी इंसान की ऊंच-नीच स्वीकार नहीं की जा सकती।
यहां एक भावुक सवाल सामने आता है—
अगर कोई बच्चा केवल इसलिए छोटा समझा जाए क्योंकि वह किसी विशेष परिवार या जाति में पैदा हुआ है, तो क्या उसके सपनों की कोई कीमत कम हो जाती है?
किसी इंसान की पहचान उसके जन्म से तय हो या उसके कर्म, प्रतिभा और इंसानियत से—यह सवाल केवल आज का नहीं है। सदियों से समाज इस प्रश्न पर विचार करता आया है।
इसीलिए मनुस्मृति पर चर्चा करते समय दो बातों को अलग-अलग समझना जरूरी है। पहली, यह एक ऐतिहासिक ग्रंथ है, जिसे भारतीय बौद्धिक और धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में पढ़ा जाता है। दूसरी, इसके कुछ सामाजिक प्रावधान आधुनिक संवैधानिक मूल्यों—समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और भेदभाव से मुक्ति—के साथ गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।
भारत का संविधान आज प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार देता है। आधुनिक भारत की व्यवस्था में किसी व्यक्ति का सम्मान या अधिकार उसके जन्म, जाति या सामाजिक स्थिति के आधार पर कम या ज्यादा नहीं हो सकता।
इसलिए मनुस्मृति को लेकर बहस केवल इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि कोई इसे मानता है या नहीं मानता। असली सवाल यह भी है कि हम अपने इतिहास से क्या सीखते हैं?
इतिहास को मिटाने से इतिहास खत्म नहीं होता और किसी पुराने ग्रंथ की आलोचना करने से वह इतिहास से गायब नहीं हो जाता। जरूरत इस बात की है कि हम अपने अतीत को समझें, उसके अच्छे-बुरे दोनों पक्षों पर ईमानदारी से बात करें और वर्तमान समाज को ऐसी दिशा दें जहां किसी बच्चे से यह न पूछा जाए कि वह किस जाति में पैदा हुआ है, बल्कि यह देखा जाए कि वह इंसान कैसा है।
क्योंकि अंततः किसी भी समाज की महानता केवल उसकी प्राचीनता में नहीं होती।
महानता तब होती है, जब उस समाज में हर इंसान को सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले।
मनुस्मृति पर बहस जारी रह सकती है, इतिहास पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन आधुनिक भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण मूल्य स्पष्ट हैं—कानून की नजर में समानता, इंसान की गरिमा और हर नागरिक के अधिकारों का सम्मान।
शायद यही वह रास्ता है, जहां हम अपने इतिहास को नकारे बिना उससे सीख सकते हैं और अपने भविष्य को और बेहतर बना सकते हैं।
मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू
संपादक: रोहित कुमार सोनू