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नवरात्रि का धार्मिक ही नहीं, है वैज्ञानिक आधार भी

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पंकज झा शास्त्री 

 इस वार शारदीय नवरात्र शक्ति की आराधना का पर्व 17अक्टूबर 2020 शनिवार से शुरु होने जा रहा है। नौ दिनों तक चलने वाली देवी की साधना को अलग अलग स्थानों पर नौ देवी, नौ दुर्गे, नवरात्रि, दुर्गा पूजा, नवरात्र जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। नौ देवियों के पूजन के विशेष दिनों को नवरात्रि कहना गलत होता है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण है। इसके स्थान पर इसे पुर्लिंग रूप नवरात्र कहना उचित होता है।

 पंडित पंकज झा शास्त्री का कहना है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल मे एक साल की चार संधियां हैं। उनमें चैत्र और अश्विन माह मे पडऩे वाली संधियों में वर्ष के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। दिन और रात के तापमान मे अंतर के कारण, ऋतु संधियों में प्राय: शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं, दरअसल, इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है कि नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है।

रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात मे ही मनाने की परंपरा है।

दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी, किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे ध्वनि प्रदूषण के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढऩे से रोक देती हैं।


मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। रात्रि मे प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं।

इसी वैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर मंत्र जप की विचार तरंगों में भी दिन के समय अवरोध रहता है, इसीलिए ऋषि मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है।

इसी वजह से साधकगण रात्रि में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं तो उनकी कार्यसिद्धि उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य पूर्ण होती है।

सहर के जाने माने पंडित पंकज झा शास्त्री के अनुसार आमतौर पर लोग दिन में ही पूजा पाठ निपटा लेते हैं, जबकि एक साधक रात्रि के महत्व को जानता है और ध्यान, मंत्रजप आदि के लिए रात्रि का समय ही चुनता है।

आयुर्वेद के अनुसार प्रकृति के इस बदलाव से जहां शरीर में वात, पित्त, कफ में दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण में रोगाणु जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं। सुखी- स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है। नवरात्र के विशेष काल में देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाए गए संयम और अनुशासन, तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं,साथ ही विभिन्न प्रकार के जड़ी बूटियों के द्वारा हवन करके कई प्रकार के रोग उत्तपन्न करने वाले विषाणु को समाप्त किया जा सकता है।

नवरात्र में नौ का महत्व - 

 हमारे शरीर में आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, वाक्, मन, बुद्धि, आत्मा ये नौ इंद्रियां हैं। बुध, शुक्र, चंद्र, बृहस्पति, सूर्य, मंगल, केतु, शनि, राहु नौ ग्रह हैं जो हमारे सभी शुभ- अशुभ के कारक होते हैं। ईश, केन, कठ, प्रश्न, मूंडक, मांडूक्य, एतरेय, तैतिरीय, श्वेताश्वतर नौ उपनिषद हैं और शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघंटा, कुशमांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी, सिद्धरात्री नौ देवियां हैं।

शरीर और आत्मा के सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।

नवरात्र का विशेष आहार बदल देता है व्यवहार- 

  सात्विक आहार से व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ सुथरे शरीर से शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थाई निवास होता है।

नवरात्र मे विशेष आहार को अधिक महत्व दिया गया है, जिसका सीधा सीधा संबंध हमारे स्वास्थ और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए ही है।

(नवरात्र में कलश का विशेष महत्व)- 🌹

 धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। देवी पुराण के अनुसार मां भगवती की पूजा-अर्चना करते समय सर्वप्रथम कलश की स्थापना की जाती है। नवरा‍त्र के दिनों में मंदिरों तथा घरों में कलश स्थापित किए जाते हैं तथा मां दुर्गा की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। 

यह कलश विश्व ब्रह्मांड, विराट ब्रह्मा एवं भू-पिंड यानी ग्लोब का प्रतीक माना गया है। इसमें सम्पूर्ण देवता समाए हुए हैं। पूजन के दौरान कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थस्थान आदि का प्रतीक मानकर स्थापित किया जाता है। 
कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं। 
 
कलश में भरा पवित्र जल इस बात का संकेत हैं कि हमारा मन भी जल की तरह हमेशा ही शीतल, स्वच्छ एवं निर्मल बना रहें। हमारा मन श्रद्धा, तरलता, संवेदना एवं सरलता से भरे रहें। यह क्रोध, लोभ, मोह-माया, ईष्या और घृणा आदि कुत्सित भावनाओं से हमेशा दूर रहें।

कलश पर लगाया जाने वाला स्वस्तिष्क का चिह्न चार युगों का प्रतीक है। यह हमारी 4 अवस्थाओं, जैसे बाल्य, युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्था का प्रतीक है।
 
 श्री पंकज झा शास्त्री ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार मानव शरीर की कल्पना भी मिट्टी के कलश से की जाती है। इस शरीररूपी कलश में प्राणिरूपी जल विद्यमान है। जिस प्रकार प्राणविहीन शरीर अशुभ माना जाता है, ठीक उसी प्रकार रिक्त कलश भी अशुभ माना जाता है।
 
इसी कारण कलश में दूध, पानी, पान के पत्ते, आम्रपत्र, केसर, अक्षत, कुंमकुंम, दुर्वा-कुश, सुपारी, पुष्प, सूत, नारियल, अनाज आदि का उपयोग कर पूजा के लिए रखा जाता है। इसे शांति का संदेशवाहक माना जाता है।

(58 वर्ष के बाद नवरात्र में बन रहा दुर्लभ योग)🌹

 इस बार 58 वर्ष के बाद शनि देव मकर में गुरु ग्रह धनु राशि में रहेंगे। 17 अक्टूबर के दिन सूर्य देव का राशि परिवर्तन भी होगा, सूर्य तुला में प्रवेश करेंगे, इस राशि में पहले से वक्री बुध भी रहेगा, इस कारण बुध और आदित्य का योग बनेगा। नवरात्र में शनि मकर में गुरु धनु राशि में रहेंगे, यह दोनों 58 वर्ष बाद एक साथ अपनी अपनी राशि में रहेंगे, वर्ष 2020 से पहले यह योग 1962 में बना था उस समय 29 सितंबर से नवरात्र शुरू हुई थी।

 इस इस वार नवरात्र पूरे नौ दिनों की होगी, इस दिन सूर्य तुला राशि में प्रवेश कर नीच के हो जाएंगे 17 अक्टूबर को बुध और चंद्र भी तुला राशि में रहेंगे, चंद्र 18 अक्टूबर को वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे, लेकिन सूर्य और बुध का यह योग बुधादित्य योग के नाम से पूरे नवरात्र तक रहेगा।

(घोड़ा पर सवार होकर आएगी देवी मां दुर्गा जबकि भैसा पर होकर करेगी प्रस्थान।)🌹

शारदीय नवरात्र 2020 में किस वाहन पर होगा माता का आगमन,कैसे करेगी प्रस्थान,क्या हो सकता है फलदेश? यह सभी को जानने की उत्सुकता होती है। 

 यह सभी जानते है कि मां दूर्गा का मुख्य वाहन शेर है,परन्तु अगर शास्त्रों की बात करे तो शास्त्र अनुसार जब आदि शक्ति जगदम्बा पृथ्वी लोक में आती है तब उनका वाहन दिन के अनुसार निर्धारित होता है। ज्योतिष दृष्टि से देखा जाए तो जिस दिन जिस वाहन से माता का आगमन और गमन होता है उस अनुसार पृथ्वी पर होने वाले फलादेश का संकेत मिल जाता है।
इस वार शारदीय नवरात्र की शुरूआत पितृपक्ष की समाप्ति के बाद हो जाती है।पंकज झा शास्त्री के अनुसार इस बार 165 साल बाद अद्भुत योग बना है। पितृ पक्ष की समाप्ति के बाद शारदीय नवरात्र शुरू नहीं होंगे, बल्कि एक महीने के बाद नवरात्रों की शुरूआत होगी। आमतौर पर पितृपक्ष के समाप्त होते ही अगले दिन नवरात्र आरंभ हो जाता है। लेकिन इस बार नवरात्र 17 अक्टूबर से शुरू होंगे,इस क्रम में 26 अक्टूबर को दशहरा होगा। पितृ पक्ष का समापन और दूर्गा पूजा के सुरुआत के बीच अंतराल अधिकमास का होना है। 

कलश स्थापन इस बार 17अक्टूबर 2020,शनिवार के दिन से प्रारंभ हो रहा है,शनिवार यानि कि माता का आगमन घोड़ा पर हो रहा है। जो चिंता का संकेत दे रहा है। घोड़ा पर माता का आगमन होने से सत्ता पक्ष में बैचेनी,प्रजा में हाहाकार,आक्रोश,हिंसा,रक्तपात,प्रशासनिक सेवा भी अस्तव्यस्त आदि हो सकती है साथ है युद्ध या युद्ध की स्थिति,धरती के हिस्से में जोड़दार झटका,दुर्घटना एवं अन्य प्राकृतिक ,अप्राकृतिक घटना जिसमें क्षति की संभावना अधिक प्रबल है।

माता दुर्गा का गमन इसवार 26अक्टूबर2020 सोमवार को है यानी मां दुर्गा प्रस्थान भैसा पर होकर करेगी। ऐसे में इस पर हम ज्योतिषीय आकलन करे तो ऐसा संकेत मिलता है कि रोग,सोक का अनुमान निश्चित है। किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की निधन,विखरता हुआ रक्त,गलत प्रवृति में बढ़ो्तरी,लोगो में मानसिक बैचेनी अधिक,एक दूसरे पर हावी,अस्थिरता का माहौल आदि होने की संभावना भी अत्यधिक प्रबलता में हो सकती है।

हम यह भी कह सकते है कि वेशक आधुनिक विज्ञान उपरोक्त फलादेश को माने या न माने। परंतु योग्य ज्योतिष हर होनेवाली घटनाओं का संकेत पहले ही कर देता है। हर ज्योतिषीय आकलन का संकेत निश्चित देखा जा सकता है। वैसे हर घटना परिवर्तनशील है।🌹

कलश स्थापना मुहुर्त
17/10/2020,शनिवार को
प्रातः 07:46 से दिन के 01:26 तक। , चित्रा नक्षत्र दिन के 02:33 तक और चंद्रमा तुला राशि में अहोरात्र रहेगा।
प्रति पदा तिथि इस दिन रात्रि 11:38 बजे तक।

वैसे समय अभाव में आप इस दिन घट स्थापना कभी भी कर सकते है कारण यह समय सिद्धि का होता है और दशो दिशा खुला हुआ माना गया है। नवरात्र में राहुकाल भी कमजोर पर जाता है।

नोट - अपने अपने क्षेत्रीय पंचांग अनुसार समय सारणी में कुछ अंतर हो सकता है।🌹

हम आदि शक्ति जगदम्बा से सभी के हित और कल्याण हेतु प्रार्थना करते है।🌹🙏🏽🌹
जय माता दी।

पंकज झा शास्त्री
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