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आत्महत्या करने के बाद क्या होता है आत्मा के साथ, जानिए रहस्य..

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पंकज झा शास्त्री 


आत्म हत्या करना किसी कायरता से कम नहीं।

 बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। मरने के बाद व्यक्ति को जो गति प्राप्त होती है उसमे.  
1.उर्ध्व गति, 2.स्थिर गति और 3.अधोगति। इसे ही अगति और गति में विभाजित किया गया है।

पहली बात तो यह कि आत्महत्या शब्द ही गलत है, लेकिन यह अब प्रचलन में है। इसलिए मुझे भी समझने हेतु आत्म हत्या जैसे शब्द का प्रयोग करना पर रहा है।

आज किसी कारण वश कई लोग आत्महत्या कर लेते है। यह घटना बहुत तेजी से बढ़ रही है।कई लोग आत्म हत्या से पहले सुसाइड नोट लिखते है कुछ तो भावुक शब्द भी लिखते है। आत्म हत्या जैसे घटना करने वाले लोग या तो मानसिक कमजोर होते है या इच्छा की पूर्ति न होने के कारण या जीवन से मोह टूटने वाले लोग होते है। ऐसे लोग किसी कायर से कम नहीं होते। इतना ही नहीं ऐसे लोगो के पास स्थिति परिस्थिति को समझने की क्षमता नहीं होती। 

अब आगे बात करते है कि आत्मा की किसी भी रीति से हत्या नहीं की जा सकती। हत्या होती है शरीर की। इसे स्वघात या देहहत्या कह सकते हैं। दूसरों की हत्या से ब्रह्म दोष लगता है लेकिन खुद की ही देह की हत्या करना बहुत बड़ा अपराध है। जिस देह ने आपको कितने भी वर्ष तक इस संसार में रहने की जगह दी। संसार को देखने, सुनने और समझने की शक्ति दी। जिस देह के माध्यम से आपने अपनी प्रत्येक इच्‍छाओं की पूर्ति की उस देह की हत्या करना बहुत बड़ा अपराध है। जरा सोचिए इस बारे में। आपका कोई सबसे खास, सगा या अपना कोई है तो वह है आपकी देह।
 
वैदिक ग्रंथों में आत्मघाती दुष्ट मनुष्यों के बारे में कहा गया है:-

असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता।
तास्ते प्रेत्यानिभगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।।

अर्थात: आत्मघाती मनुष्य मृत्यु के बाद अज्ञान और अंधकार से परिपूर्ण, सूर्य के प्रकाश से हीन, असूर्य नामक लोक को गमन कहते हैं।

अधर में लटक जाती आत्मा :
गरूड़ पुराण में जीवन और मृत्‍यु के हर रूप का वर्णन किया गया है। आत्‍महत्‍या को निंदनीय माना जाता है, क्‍योंकि धर्म के अनुसार कई योनियों के बाद मानव जीवन मिलता है ऐसे में उसे व्‍यर्थ गंवा देना मूर्खता और अपराध है।
 कहते हैं कि जो व्‍यक्ति आत्‍महत्‍या करता है उसकी आत्‍मा हमारे बीच ही भटकती रहती है, न ही उसे स्‍वर्ग/नर्क में जाने को मिलता है न ही वह जीवन में पुन: आ पाती है। ऐसे में आत्‍मा अधर में लटक जाती है। ऐसे आत्मा को तब तक ठिकाना नहीं मिलता जब तक उनका समय चक्र पूर्ण नहीं हो जाता है। इसीलिए आत्‍महत्‍या करने के बाद जो जीवन होता है वो ज्‍यादा कष्‍टकारी होता है।
 जीवन के चक्र को समझना जरूरी है : जैसे पूर्ण पका फल ही खाने योग्य होता है। जब फल पक जाता है तभी वह वृक्ष को त्याग कर खुद ही वृक्ष बनने की राह पर निकल पड़ता है। इसी तरह पूर्ण आयु जीकर मरा मनुष्य अच्छे जीवन के लिए निकल पड़ता है। कहते हैं कि मानव जीवन के 7 चरण होते हैं और प्राकृतिक प्रक्रिया के अनुसार, एक के पूरा होने के बाद ही दूसरी शुरू होती है। इसका सही समय और सही क्रम होता है। ऐसे में समय से पूर्व ही मृत्‍यु हो जाने से क्रम गड़बड़ हो जाता है। जिन व्‍यक्तियों की मृत्‍यु प्राकृतिक कारणों से होती है उनकी आत्‍मा भटकती नहीं और नियमानुसार उनके जीवन के 7 चरण पूरे हो चुके होते हैं। लेकिन जिन लोगों की मृत्‍यु, आत्‍महत्‍या करने के कारण होती है वो चक्र को पूरा न कर पाने के कारण अधर में रह जाते हैं। सभी को हर स्थिति परिस्थिति में होसला बुलंद करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
🌹🙏🌹
पंकज झा शास्त्री
9576281913

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