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बिना दहेज लिए रचाई शादी, समाज को दिया संदेश, यह शादी समाज के लोगों के लिए बनी मिसाल

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सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र ने दहेज मुक्त शादी रचाकर समाज में दिया अनूठा संदेश, दुनिया भर में हो रहीं है चर्चा

दुल्हन ही दहेज: सैंड आर्टिस्ट

वर पक्ष ने शगुन के तौर पर दहेज नहीं लेकर 1 रुपया व श्रीफल लिया



दुल्हन ही दहेज के संस्थापक सह सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र कुमार ने दहेज मुक्त शादी रचा कर समाज में संदेश देते हुए दहेज लोभियों को करारा जवाब देने के साथ सरकार के संदेश दहेज मुक्त विवाह के नारों को आत्मसात करने का काम किया है

प्रिंस कुमार 

मोतिहारी: दुल्हन ही दहेज हैं इस वाक्य को वास्तव में सिद्ध कर करते पूर्वी चम्पारण जिले के बिजबनी घोड़ासहन निवासी प्रख्यात सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र ने, बिना दहेज लिये ही वर और वधु दोनों पक्षों के रजामंदी से अपनी शादी रचाकर समाज को अनूठा संदेश दिया है। मधुरेन्द्र समाज में दहेज के लिए हो रहें हमारे बहन बेटियों के साथ जघन्य घटनाओं से काफी दुःखी हैं। जानकारी के अनुसार 1 फरवरी शनिवार के दिन मुंगेर जिले में स्थापित प्रसिद्ध शक्तिपीठ चंडिका स्थान मंदिर परिसर में हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार रेत कला के महानायक मधुरेन्द्र कुमार का विवाह कुमारी दीपिका के साथ संपन्न हो गया। पटना सिटी की रहने वाली कानू हलवाई समुदाय की वधु ग्रेजुएट दीपिका कुमारी पेशा से प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका हैं। इसमें वर पक्ष ने दहेज नहीं लेकर 1 रुपया व नारियल शगुन के तौर पर लिया। लड़की पक्ष से मुंगेर के तोपखाना बाजार निवासी प्रदीप कुमार गुप्ता को अपनी ज्येष्ठ पुत्री कुमारी दीपिका के रूप में कन्यादान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि सामाजिक स्तर पर दहेज मुक्त शादी रचा कर समाज में संदेश देते हुए दहेज लोभियों को करारा जवाब देने के साथ-साथ सरकार के संदेश दहेज मुक्त विवाह के नारों को आत्मसात करने का काम किया है। दुनियाभर में यह शादी सामाज के लोगों के लिए मिसाल बन गई। कोरोनावायरस की विशेष परिस्थिति में मास्क पहना और सामाजिक दूरी के नियम का अक्षरशः पालन किया गया।

बता दें कि दहेज मुक्त शादी की पहल करने वाले दुल्हन ही दहेज के संस्थापक सह प्रख्यात सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र कुमार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनका प्रयास समाज में लड़के-लड़की के भेद को मिटाने का रहा हैं। उन्होंने दुल्हन ही दहेज है का संदेश भी दोहराया। वधू कुमारी दीपिका प्रदीप कुमार गुप्ता के एक बेटे व तीन बेटियों में ज्येष्ठ पुत्री है। इस विवाह के दौरान मात्र एक रूपया व श्रीफल लेकर वधु को घर लेकर लाया गया है।

गौरतलब हो कि परिवार का इस प्रकार के फैसला समाज के लिए अनुकरणीय कदम हैं, समाज में इस तरह के उदाहरण से दहेज प्रथा का अन्त होगा। सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र ने यह भी बताया कि अब समय आ गया है कि दहेज जैसी सामाजिक बुराई को हम सभी को मिलकर हटाना होगा। इस कुरिती को खत्म किए बिना समाज का भला नहीं हो सकता है। इस विवाह में महंगे वस्त्र सहित बैंड बाजा, घोड़ी चढ़त, नाच गाना कुछ भी नहीं थे।

क्षेत्र के लोगों ने भी सामाजिक बदलाव के लिए दहेज की इस अनूठी पहल की सराहना की

मौके पर उपस्थित एनसीपी श्रमिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष संजय केसरी, अंतरजातीय अंतर्धार्मिक कमिटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश गुप्ता, मुकेश मिश्रा, पूर्व जिप शंकर प्रसाद गुप्ता, रामप्रीत सह अमीन, पूर्व पैक्स अध्यक्ष सुरेंद्र महतो, उप मुखिया गौरी शंकर साह, डॉ राजदेव प्रसाद, टुनटुन श्रीवास्तव, गिरधारी कुमार, मोहन पटेल, मनोज कुमार, राजेश कुमार मिश्रा, आयुष कुमार समेत सैकड़ो लोग इस दहेजमुक्त शादी के साक्षी बनें। दहेज मुक्त शादी के बाद क्षेत्र के लोगों ने सामाजिक बदलाव के लिए इस प्रयास की सराहना भी की है। लड़की पक्ष के परिवार के लोगो के अलावा बड़ी संख्या में वर पक्ष के लोग भी बाराती के रूप में उपस्थित होकर प्रेमी युगल जोड़ी के दहेज मुक्त शादी समारोह को अविस्मरणीय बना दिया।

समाज के लिए अभिशाप हैं दहेज प्रथा- सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र

दहेज प्रथा समाज के लिए अभिशाप हैं। विवाह में दहेज प्रथा भी बहुत भयावह रूप ले चुकी है । इससे समाज के सभी वर्गों की पीड़ा में वृद्धि हुई है । दहेज प्रथा शादी के पुण्य आयोजन को तहस-नहस कर देती है। अब विवाह एक व्यापार बन गया है जिसके कारण महिलाओं की स्थिति बहुत शोचनीय हो गई है। जब तक इस कलंक को खत्म नहीं किया जाएगा, तब तक भारतीय समाज पूरी तरह विकसित नहीं हो सकता। सरकार ने दहेज निषेध अधिनियम लागू किया है लेकिन समाज पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा है।

आर्थिक, मानसिक और शारीरिक कष्टों का कारण हैं, दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरुतियां- मधुरेन्द्र

"दुल्हन ही दहेज" के संस्थापक सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र बताते हैं कि दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरुतियां जैसे आर्थिक, मानसिक और शारीरिक ये सब कष्टों का कारण हैं। मनुष्य बहुत सी परंपराओं के बोझ के तले दबा जा रहा है । प्राचीन काल में आडंबर बहुत कम मात्रा में थे लेकिन समयान्तर में इनका रूप बदलता गया। मनुष्य सामाजिकता के नाते समाज के डर इन रीति रिवाजों को निभाता चला आ रहा है । परिणाम यह है कि आर्थिक, मानसिक और शारीरिक कष्टों को भोग रहा है। कई प्रकार की परेशानियों का कारण सामाजिक कुरीतियां जैसे मान बड़ाई, लोक दिखावा, महंगी चीजों को संग्रह करने की होड़, जन्म – मृत्यु पर आयोजन, विवाह में दहेज मांगना, बैंड बाजा, डीजे बजाना, सड़कों पर नृत्य करना, नशावृत्ति, मांसाहार, इत्यादि हैं।

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