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विलय की लय में राजद जदयू?

अनूप नारायण सिंह 
पटना।राजनीति में कब कहां कैसे होगा किसी को नहीं पता है पर जो होगा उसका अनुमान पहले से ही हवा के बदले रुख को देखकर लगाया जा सकता है ऐसे ही सियासी हवा इन दिनों बिहार में है खबर है कि वर्ष 2023 में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जदयू और लालू प्रसाद यादव के राजद का विलय होगा नए पार्टी का नाम क्या होगा इसको लेकर भी मंथन चल रहा है।जो लोग समझ रहे हैं वो चुप हैं और ऐलान के इंतजार में हैं। जो नहीं समझ रहे हैं वो परेशान हैं कि लालू यादव 25 साल पुरानी अपनी पार्टी का नाम या चुनाव चिह्न अब क्यों बदलना चाहते हैं जिसके लिए वो संविधान में संशोधन तक करवा रहे हैं।

जो समझ रहे हैं उनका अनुमान है कि ये आने वाले दिनों में नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के मिलकर एक हो जाने और एक नई पार्टी बनाने की तैयारी है। ऐसा क्यों हो सकता है, इसे समझना होगा।

वैसे लालू और नीतीश की पार्टियों के विलय की बातें 2015 में भी गंभीर रूप से हुई थीं जब सपा, आरजेडी, जेडीयू, जेडीएस, इनेलो और सजपा ने मिलकर जनता परिवार बनाने का ऐलान किया था लेकिन वो बात ऐलान से आगे नहीं बढ़ सकी। मुलायम सिंह यादव को इस नई पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में तीन सीट ऑफर होने पर सपा ने ही सबसे पहले रास्ता अलग कर लिया।2015 में नीतीश और लालू ने मिलकर बिहार में विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीतने के बाद नीतीश ने सरकार बनाई थी। फिर नीतीश 2017 में वापस एनडीए के पास चले गए और इस साल साल अगस्त में फिर से आरजेडी के साथ वापस आ गए।
नीतीश इस बार जब लालू यादव के साथ आए तो माहौल अलग था। बीजेपी दूसरे और जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी थी। विधानसभा में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी थी। असदुद्दीन ओवैसी के चार विधायकों के आरजेडी में शामिल होने से विधानसभा में बीजेपी से बड़ी आरजेडी पार्टी बनी। राजनीति के गलियारों में यह कहा जाता है कि ये चार विधायक जेडीयू में जाना चाहते थे लेकिन वहीं से इशारा हुआ कि आरजेडी में जाकर विधानसभा में उसे सबसे बड़ी पार्टी बनाया जाए।
ताकि बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद अगर राजभवन गठबंधन के बदले सबसे बड़ी पार्टी को ही पहला मौका देना चाहे तो भी बीजेपी सरकार नहीं बना सके। प्लान कामयाब रहा। राजभवन ने कोई अड़चन भी नहीं पैदा की। एक दिन एनडीए सरकार के सीएम के तौर पर नीतीश का इस्तीफा हुआ। अगले दिन महागठबंधन सरकार के सीएम के तौर पर शपथ हो गया।बिहार में सरकार चला रहे गठबंधन में बदलाव अगस्त में हुआ जब एनडीए की जगह महागठबंधन सरकार बन गई। इससे पहले जून में महाराष्ट्र में बीजेपी ने ऑपरेशन लोटस का कमाल दिखा दिया था। 55 विधायकों वाली शिवसेना के मुखिया और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को जब तक बगावत की खबर लगी तब तक उनके 40 विधायक एकनाथ शिंदे के साथ घूम रहे थे।सरकार बदल गई और आखिरी मौके पर बीजेपी ने देवेंद्र फड़णवीस को झटका देते हुए बागी गुट के शिंदे को सीएम बना दिया जिससे ये लगे कि ये ऑपरेशन लोटस नहीं था। बगावत शिवसेना की थी और सरकार बनाने के लिए हमने समर्थन दिया।महाराष्ट्र का खौफ बिहार में काम कर रहा था। नीतीश की जेडीयू के विधायक तो 45 ही थे। ऊपर से उनके पुराने अध्यक्ष और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह बागी हो चुके थे। एनडीए छोड़ने के बाद जेडीयू अध्यक्ष ललन सिंह ने बताया कि आरसीपी सिंह बीजेपी के साथ मिल गए थे और जेडीयू को तोड़ने की साजिश कर रहे थे। तो इस तरह नीतीश की लालू के घर वापसी हुई।
2017 में नीतीश और जेडीयू से एक बार बीच सरकार धोखा खा चुके लालू यादव और तेजस्वी यादव ने 2020 में तीसरी बड़ी पार्टी जेडीयू के नेता नीतीश को मुख्यमंत्री कबूल कर लिया तो जरूर कोई राजनीतिक सौदेबाजी हुई होगी। नीतीश कुमार महागठबंधन में आने के बाद से ही 2024 के चुनाव के लिए विपक्षी दलों को एकजुट करने के मिशन में लग गए हैं जो राष्ट्रीय राजनीति में उनकी दिलचस्पी का इशारा है।लालू भी यही चाहते होंगे कि तेजस्वी बिहार में मुख्यमंत्री बनें और नीतीश दिल्ली की राजनीति करें। इसी राजनीतिक सेट-अप को तैयार करने के लिए आरजेडी और जेडीयू को मिलाकर एक बड़ी और मजबूत पार्टी बनाने की कोशिश हो सकती है।
जेडीयू और आरजेडी के मिलने से बनने वाली नई पार्टी के पास विधानसभा में 123 विधायकों का समर्थन होगा जो बहुमत से ज्यादा है। दूसरी बात, विधानसभा में पार्टी जितनी बड़ी होगी, ऑपरेशन लोटस का खतरा उतना ही कम होगा। जेडीयू के 45 विधायकों में दो तिहाई को तोड़ना जितना आसान होगा, उतना आसान 123 विधायकों की पार्टी को तोड़ना नहीं रहेगा।इसलिए नीतीश और लालू दोनों अपने विधायकों, सांसदों और अपनी-अपनी पार्टियों को भाजपा के आक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए एकजुट ही नहीं एक होने की कोशिश कर सकते हैं। महागठबंधन में दोनों दलों का बने रहना इसके लिए काफी नहीं है। दोनों का एक हो जाना मजबूरी है।राजनीतिक गलियारों में पर्याप्त चर्चा है कि 2023 में लालू यादव और नीतीश कुमार आरजेडी और जेडीयू के विलय के साथ एक नई पार्टी का ऐलान कर सकते हैं। आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने कहा भी था कि 2023 में तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाकर नीतीश दिल्ली की राजनीति करेंगे। लेकिन नीतीश जिस कद के नेता हैं, उन्हें ये फॉर्मूला कतई कबूल नहीं होगा कि आरजेडी में विलय करके जेडीयू अपना अस्तित्व खत्म कर ले और आरजेडी बनी रहे।नीतीश विलय की सूरत में इस शर्त पर अड़ सकते हैं कि अगर जेडीयू और तीर छाप खत्म होगा तो आरजेडी और लालटेन को भी इतिहास में डालना होगा। नहीं तो आरजेडी में शरद यादव और देवेंद्र यादव की पार्टियों का विलय हो चुका है और दोनों बिना नाम या चुनाव चिह्न में बदलाव के आरजेडी में समाहित हो गईं।शायद यही वजह रही होगी कि आरजेडी ने लालू यादव और तेजस्वी यादव को संविधान में संशोधन करके पूरी तरह ये अधिकार दे दिया है कि समय आने पर वो पार्टी के नाम और लालटेन चुनाव चिह्न को लेकर कोई भी फैसला कर सकें।लालू या तेजस्वी इस अधिकार का इस्तेमाल कब करेंगे, इसका जवाब सिर्फ नीतीश कुमार दे सकते हैं।

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